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निष्काम कर्म का वास्तविक अर्थ क्या है? गीता के अनुसार समझिए इसका गहरा अर्थ

Dharma Darshan | 02 Sep 2026 | 45 Views
निष्काम कर्म का वास्तविक अर्थ क्या है? गीता के अनुसार समझिए इसका गहरा अर्थ
“निष्काम कर्म” शब्द आपने शायद कई बार सुना होगा।

किसी ने कहा होगा:
“बिना किसी स्वार्थ के काम करना ही निष्काम कर्म है।”

या फिर:
“कर्म करो, फल की इच्छा मत करो।”

लेकिन क्या वास्तव में निष्काम कर्म का अर्थ बिना किसी इच्छा के काम करना है?

अगर ऐसा है, तो क्या एक student अच्छे marks की इच्छा के बिना पढ़े?

क्या कोई व्यक्ति promotion की इच्छा के बिना अपना काम करे?

क्या कोई किसान अच्छी फसल की उम्मीद न करे?

यहाँ से निष्काम कर्म को समझने की असली जरूरत शुरू होती है।

भगवद्गीता में निष्काम कर्म का विचार केवल इच्छा छोड़ देने की बात नहीं करता। यह व्यक्ति के कर्म, कर्तव्य, आसक्ति, स्वार्थ और कर्मफल के प्रति उसके दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ एक गहरा विचार है।

सरल शब्दों में कहें तो:
निष्काम कर्म का अर्थ कर्म करना छोड़ना नहीं, बल्कि कर्मफल की स्वार्थपूर्ण आसक्ति से मुक्त होकर अपने कर्तव्य और कर्म को उचित भावना से करना है।

आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।
निष्काम कर्म क्या है?

निष्काम का सामान्य अर्थ है:

कामना से रहित।

और कर्म का अर्थ है:
कार्य या किया जाने वाला कर्म।

इसलिए “निष्काम कर्म” का शाब्दिक अर्थ हो सकता है:

कामना से मुक्त कर्म।

लेकिन यहाँ “कामना से मुक्त” को यह समझ लेना कि व्यक्ति के अंदर कोई लक्ष्य, इच्छा या ambition ही नहीं होनी चाहिए, सही नहीं होगा।

गीता के संदर्भ में महत्वपूर्ण बात है कर्मफल के प्रति आसक्ति।
व्यक्ति अपना कर्तव्य करता है, पूरी क्षमता से प्रयास करता है, लेकिन केवल व्यक्तिगत लाभ या परिणाम को ही अपने कर्म का एकमात्र उद्देश्य नहीं बना देता।

यही निष्काम कर्म की दिशा को समझने की कुंजी है।
क्या निष्काम कर्म का अर्थ “फल की इच्छा मत करो” है?
यह सबसे आम सवाल है।

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक है:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
— भगवद्गीता 2.47

सरल अर्थ में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, केवल उसके फल पर नहीं। कर्मफल को ही कर्म का एकमात्र कारण मत बनाओ और अकर्मण्यता में भी आसक्त मत हो।

इस श्लोक में तीन महत्वपूर्ण बातें दिखाई देती हैं:

1. कर्म करना जरूरी है
गीता व्यक्ति को निष्क्रिय होने के लिए नहीं कहती।

2. फल पर पूर्ण अधिकार नहीं है
व्यक्ति कर्म कर सकता है, लेकिन हर परिस्थिति और अंतिम परिणाम को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता।

3. फल को ही कर्म का एकमात्र उद्देश्य मत बनाओ
अगर व्यक्ति केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए काम करता है, तो उसकी मानसिकता परिणाम के साथ अत्यधिक बंध सकती है।

इसलिए:
निष्काम कर्म = कर्म छोड़ना नहीं।
निष्काम कर्म = फल की पूरी तरह उपेक्षा करना भी नहीं।
यह मुख्यतः फल के प्रति आसक्ति और स्वार्थपूर्ण मानसिकता से दूरी का विचार है।

निष्काम कर्म और कर्मयोग में क्या संबंध है?
इन दोनों concepts को अलग-अलग समझना जरूरी है, लेकिन वे आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
कर्मयोग एक व्यापक दृष्टिकोण है जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्य और कर्म को उचित भावना से करता है और कर्मफल के प्रति अनावश्यक आसक्ति से बचने का प्रयास करता है।

निष्काम कर्म इस दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसे इस तरह समझ सकते हैं:
कर्मयोग वह व्यापक मार्ग है, जबकि निष्काम कर्म उस मार्ग की महत्वपूर्ण कार्य-पद्धति है।
इसलिए हर बार “निष्काम कर्म” को केवल एक isolated concept की तरह देखने के बजाय गीता के कर्मयोग के व्यापक संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी है।

निष्काम कर्म का अर्थ इच्छा खत्म करना नहीं है
यहाँ सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है।
मान लीजिए एक student परीक्षा में अच्छे marks लाना चाहता है।
क्या उसे अपनी यह इच्छा पूरी तरह खत्म कर देनी चाहिए?
नहीं।
वह लक्ष्य रख सकता है।
वह मेहनत कर सकता है।
वह बेहतर strategy बना सकता है।
वह mock tests दे सकता है।
वह अपनी गलतियों को सुधार सकता है।
लेकिन अगर उसकी पूरी मानसिक स्थिति इस पर निर्भर हो जाए:
“अगर मुझे 95% नहीं मिले तो मैं असफल इंसान हूँ।”
तो वह परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्त हो सकता है।

निष्काम कर्म का व्यावहारिक अर्थ यह हो सकता है:
अच्छे marks के लिए पूरी मेहनत करो, लेकिन अपनी पूरी पहचान और मानसिक शांति को marks के हवाले मत कर दो।

इच्छा और आसक्ति में अंतर
निष्काम कर्म को समझने के लिए इच्छा और आसक्ति में अंतर समझना जरूरी है।

इच्छा
“मैं इस परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करना चाहता हूँ।”
यह एक सामान्य goal हो सकता है।

आसक्ति
“अगर मैं इसमें सफल नहीं हुआ तो मैं कुछ भी नहीं हूँ।”
यह परिणाम के साथ अत्यधिक मानसिक जुड़ाव है।

इसी तरह:
“मुझे promotion चाहिए।”
यह लक्ष्य हो सकता है।

लेकिन:
“Promotion नहीं मिला तो मेरी जिंदगी बेकार है।”

यह अत्यधिक आसक्ति हो सकती है।
इसलिए निष्काम कर्म का अर्थ ambition को खत्म करना नहीं है।
यह ambition को विवेक और संतुलन के साथ देखने की दिशा देता है।

निष्काम कर्म का सबसे सरल उदाहरण
एक शिक्षक का उदाहरण लेते हैं।
एक शिक्षक ईमानदारी से अपने students को पढ़ाता है।
वह lesson plan बनाता है।
वह students की समस्याएँ समझता है।
वह अपनी teaching improve करता है।
लेकिन हर student का result केवल उसके हाथ में नहीं है।
कुछ students मेहनत करेंगे।
कुछ नहीं करेंगे।
कुछ परिस्थितियों के कारण अच्छा perform नहीं कर पाएँगे।

Teacher का काम है:
अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाना।

यही कर्म पर ध्यान है।

लेकिन अगर teacher हर student के result को अपनी personal identity बना ले, तो मानसिक दबाव बढ़ सकता है।
निष्काम कर्म व्यक्ति को अपने कर्तव्य और प्रयास पर केंद्रित रहने की दिशा देता है।
निष्काम कर्म का अर्थ स्वार्थ छोड़ना भी है
निष्काम कर्म में एक महत्वपूर्ण पहलू स्वार्थ से दूरी है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति समाज की मदद करता है, लेकिन उसका पूरा उद्देश्य केवल publicity और personal recognition है।
बाहर से कर्म अच्छा दिखाई दे सकता है।

लेकिन उसकी motivation पर सवाल उठ सकता है।
इसके विपरीत, कोई व्यक्ति किसी जरूरतमंद की मदद करता है क्योंकि उसे लगता है कि मदद करना उसका मानवीय कर्तव्य है।
यह निष्काम कर्म की भावना के अधिक करीब हो सकता है।

हालाँकि वास्तविक जीवन में motivations हमेशा इतनी साफ नहीं होतीं।
इंसान के भीतर कई तरह की इच्छाएँ एक साथ मौजूद हो सकती हैं।

इसलिए निष्काम कर्म को एक perfect psychological state की तरह देखने के बजाय एक ऐसी दिशा के रूप में समझना अधिक व्यावहारिक है जिसमें व्यक्ति अपने कर्म को केवल स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ से संचालित होने से बचाने की कोशिश करता है।

निष्काम कर्म का मतलब परिणाम की अनदेखी करना नहीं है
यह point बहुत महत्वपूर्ण है।
अगर कोई doctor यह कहे:
“मैंने इलाज कर दिया। अब result की मुझे कोई चिंता नहीं।”
तो क्या यह professional responsibility होगी?
नहीं।
Doctor को patient के outcome को monitor करना होगा।

इसी तरह:
Business में results देखना जरूरी है।
Education में performance देखना जरूरी है।
Sports में score देखना जरूरी है।
Career में progress देखना जरूरी है।

तो फिर निष्काम कर्म का मतलब क्या है?
परिणाम को देखिए।
परिणाम से सीखिए।
अपनी strategy सुधारिए।
लेकिन परिणाम को अपने अहंकार और मानसिक शांति का मालिक मत बनने दीजिए।
यही distinction बहुत महत्वपूर्ण है।

निष्काम कर्म और लापरवाही में अंतर
कई बार लोग निष्काम कर्म को अपने excuses का justification बना लेते हैं।

उदाहरण:
“मुझे result की चिंता नहीं है, इसलिए मैं पढ़ाई भी ज्यादा नहीं करूंगा।”
यह निष्काम कर्म नहीं है।
या:
“Profit की चिंता नहीं करनी चाहिए, इसलिए business planning की जरूरत नहीं।”
यह भी गलत है।
या:
“जो होगा देखा जाएगा।”
यह कर्मयोग नहीं, कई बार अकर्मण्यता या लापरवाही हो सकती है।
गीता 2.47 में ही “मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि” कहा गया है। यानी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो।

इसलिए निष्काम कर्म का मतलब:
कम effort + कम responsibility + result की परवाह नहीं
नहीं है।

बल्कि:
ईमानदार कर्म + पूरी कोशिश + विवेक + फल के प्रति अनावश्यक आसक्ति से दूरी
है।

निष्काम कर्म और सफलता
क्या निष्काम कर्म करने वाला व्यक्ति सफल हो सकता है?
बिल्कुल।
वास्तव में निष्काम कर्म को सफलता के खिलाफ खड़ा करना भी गलत होगा।
एक athlete जीतना चाहता है।
एक entrepreneur business बढ़ाना चाहता है।
एक student अच्छे marks चाहता है।
एक researcher नई discovery करना चाहता है।
इन सभी के goals हो सकते हैं।

समस्या लक्ष्य में नहीं है।
समस्या तब हो सकती है जब:
लक्ष्य → आसक्ति → भय → मानसिक असंतुलन → गलत निर्णय
का चक्र शुरू हो जाए।

निष्काम कर्म व्यक्ति को इस चक्र से कुछ दूरी बनाने में मदद कर सकता है।

निष्काम कर्म और असफलता
निष्काम कर्म का सबसे बड़ा practical test अक्सर असफलता के समय होता है।
सफलता मिलने पर detached रहना आसान हो सकता है।

लेकिन असफलता मिलने पर?
यहीं सवाल आता है:
क्या मैं परिणाम से सीखूँगा या परिणाम मुझे तोड़ देगा?

मान लीजिए आपने किसी competitive exam की तैयारी की और selection नहीं हुआ।
निष्काम कर्म का अर्थ यह नहीं:
“Selection की जरूरत ही नहीं थी।”
बल्कि:
“मैंने पूरी तैयारी की। Result मेरे पक्ष में नहीं आया। अब मुझे ईमानदारी से देखना है कि कमी कहाँ रही और आगे क्या करना है।”
यानी:
Failure = Feedback
न कि:
Failure = Identity

निष्काम कर्म और सफलता का अहंकार

निष्काम कर्म केवल failure को संभालने की शिक्षा नहीं देता।
यह success के समय भी उपयोगी है।
अगर सफलता मिलते ही व्यक्ति सोचने लगे:
“मैं ही सबसे महान हूँ।”
तो अहंकार बढ़ सकता है।

वास्तविकता यह है कि किसी भी उपलब्धि में केवल व्यक्ति का प्रयास ही नहीं होता।

उसके पीछे:
परिस्थितियाँ
अवसर
परिवार
teachers
colleagues
resources
timing
समाज

जैसे कई factors भी भूमिका निभा सकते हैं।

इसलिए सफलता में विनम्रता और असफलता में संतुलन, दोनों महत्वपूर्ण हैं।
निष्काम कर्म को आज की जिंदगी में कैसे अपनाएँ?
निष्काम कर्म केवल धार्मिक या दार्शनिक चर्चा का विषय बनकर रह जाए, तो उसका practical value कम हो जाता है।

इसे रोजमर्रा के जीवन में इस तरह समझ सकते हैं।
1. लक्ष्य तय करें
Goalless होना जरूरी नहीं है।
आपको पता होना चाहिए कि आप क्या हासिल करना चाहते हैं।

2. अपने control वाले काम पहचानें
आपकी preparation आपके control में है।
दूसरों की reaction पूरी तरह आपके control में नहीं।

3. पूरी मेहनत करें
निष्काम कर्म का मतलब mediocre effort नहीं है।
श्रेष्ठ प्रयास कीजिए।

4. परिणाम को स्वीकार करें
Result अच्छा हो तो विनम्र रहें।
Result खराब हो तो सीखें।

5. अपनी strategy बदलें
निष्काम कर्म का अर्थ एक ही तरीके से लगातार काम करते रहना नहीं है।
अगर तरीका काम नहीं कर रहा, तो उसे बदलना भी जरूरी है।

6. अपनी पहचान को परिणाम से अलग रखें
आपका exam result, salary, promotion या business profit आपकी पूरी पहचान नहीं है।

Students के लिए निष्काम कर्म
Students के लिए यह concept विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
मान लीजिए आपका लक्ष्य है:
“मुझे 90% से ज्यादा marks चाहिए।”
यह goal ठीक है।
लेकिन preparation के दौरान हर दिन यही सोचना:
“अगर 90% नहीं आए तो क्या होगा?”
आपके focus को नुकसान पहुँचा सकता है।

इसके बजाय:
Daily study target बनाइए।
Weak subjects पर काम कीजिए।
Mock tests दीजिए।
Mistakes analyze कीजिए।
Revision कीजिए।
और exam के बाद:
Result को feedback की तरह देखिए।

यही कर्म और कर्मफल के बीच संतुलन बनाने का practical तरीका हो सकता है।

Career में निष्काम कर्म
Career में भी हम अक्सर परिणाम से अपनी identity जोड़ लेते हैं।
“मुझे promotion नहीं मिला।”
“मेरी salary कम है।”
“मुझे उस company में job नहीं मिली।”
“मेरी उम्र के लोग मुझसे आगे निकल गए।”
यह comparison लगातार frustration पैदा कर सकता है।

निष्काम कर्म का दृष्टिकोण यह पूछ सकता है:
मैं आज कौन-सा बेहतर कर्म कर सकता हूँ?
कौन-सी skill सीख सकता हूँ?
कौन-सी mistake सुधार सकता हूँ?
किससे feedback ले सकता हूँ?
कौन-सा नया opportunity explore कर सकता हूँ?

इसका मतलब ambition छोड़ना नहीं है।
बल्कि ambition को action और learning से जोड़ना है।
निष्काम कर्म और Social Media का युग
आज यह concept एक और कारण से relevant है।

Social media ने comparison को बहुत आसान बना दिया है।
आप किसी की success देखते हैं:
नई car।
नई job।
Promotion।
Foreign trip।
Business success।
और फिर अपनी जिंदगी से उसकी तुलना करते हैं।

समस्या यह है कि आप उसकी highlight reel की तुलना अपनी behind-the-scenes reality से कर रहे होते हैं।
निष्काम कर्म का दृष्टिकोण आपको वापस अपने कर्म की ओर ला सकता है:
“दूसरा क्या कर रहा है?” से ज्यादा महत्वपूर्ण है, “मैं क्या कर रहा हूँ?”
क्या निष्काम कर्म आसान है?
ईमानदारी से कहें तो नहीं।
अगर परिणाम हमारे लिए बिल्कुल महत्वपूर्ण न हो, तो आसक्ति से बचना आसान होता।
लेकिन वास्तविक जीवन में परिणाम महत्वपूर्ण होते हैं।

इसीलिए निष्काम कर्म को कोई एक दिन में प्राप्त कर लेने वाली स्थिति मानना व्यावहारिक नहीं है।
यह एक अभ्यास है।
बार-बार खुद से पूछना:
क्या मैं अपने कर्तव्य पर ध्यान दे रहा हूँ?
क्या मेरा निर्णय केवल स्वार्थ से driven है?
क्या मैं परिणाम के डर से अपना कर्म छोड़ रहा हूँ?
क्या सफलता ने मेरा अहंकार बढ़ा दिया है?
क्या असफलता ने मेरी पहचान को हिला दिया है?

ऐसे सवाल व्यक्ति को अपने कर्म और मानसिकता को समझने में मदद कर सकते हैं।

निष्काम कर्म की 5 सबसे बड़ी गलतफहमियाँ

गलतफहमी 1: निष्काम कर्म का मतलब कोई इच्छा नहीं रखना
गलत।
Goal और ambition होना अपने आप में निषिद्ध नहीं है। मुद्दा फल के प्रति अत्यधिक आसक्ति और स्वार्थपूर्ण मानसिकता का है।

गलतफहमी 2: Result महत्वपूर्ण नहीं है
गलत।
परिणाम महत्वपूर्ण है। उससे सीखना और strategy सुधारना भी जरूरी है।

गलतफहमी 3: निष्काम कर्म मतलब मेहनत कम करना
बिल्कुल गलत।
गीता अकर्मण्यता का समर्थन नहीं करती।

गलतफहमी 4: निष्काम कर्म मतलब हर चीज को भाग्य पर छोड़ देना
गलत।
कर्मयोग action और responsibility पर जोर देता है।

गलतफहमी 5: निष्काम कर्म सिर्फ धार्मिक जीवन के लिए है
जरूरी नहीं।
इसके विचार को education, career, leadership, business और personal life में भी philosophical framework की तरह समझा जा सकता है।

निष्काम कर्म का वास्तविक अर्थ एक उदाहरण से समझिए

मान लीजिए दो students एक ही परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

Student A
उसका पूरा ध्यान है:
“मुझे किसी भी हालत में top करना है।”
हर test के बाद anxiety।
दूसरों के marks देखकर stress।
छोटी गलती पर confidence खत्म।

Student B
उसका लक्ष्य भी top करना है।
लेकिन वह कहता है:
“मेरा लक्ष्य स्पष्ट है। मैं पूरी मेहनत करूंगा। अपनी कमजोरियों को सुधारूंगा। Result मेरे लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन मैं अपनी पूरी पहचान result से नहीं जोड़ूंगा।”

दूसरा student निष्काम कर्म की भावना को अधिक व्यावहारिक रूप से समझ रहा है।
दोनों में ambition है।
अंतर है आसक्ति में।
निष्काम कर्म का सार क्या है?

अगर इसे कुछ सरल बिंदुओं में समझें तो:
कर्तव्य पहचानो।
लक्ष्य निर्धारित करो।
पूरी ईमानदारी से कर्म करो।
अपने कर्म की गुणवत्ता सुधारो।
परिणाम को स्वीकार करो।
परिणाम से सीखो।
लेकिन परिणाम को अपनी पूरी पहचान मत बनने दो।
यही निष्काम कर्म की व्यावहारिक समझ की ओर एक रास्ता है।

निष्कर्ष
निष्काम कर्म का वास्तविक अर्थ “बिना किसी इच्छा के काम करना” भर नहीं है।
यह उससे कहीं अधिक सूक्ष्म विचार है।
भगवद्गीता के संदर्भ में इसे अपने कर्तव्य और कर्म को पूरी ईमानदारी से करते हुए कर्मफल के प्रति अनावश्यक आसक्ति और स्वार्थपूर्ण आग्रह से मुक्त होने की दिशा के रूप में समझा जा सकता है।

इसका अर्थ लक्ष्य छोड़ना नहीं।
महत्वाकांक्षा छोड़ना नहीं।
परिणाम की अनदेखी करना नहीं।
और निश्चित रूप से कर्म से भागना नहीं।

बल्कि:
कर्म में पूरी निष्ठा रखिए, परिणाम से सीखिए, लेकिन अपनी मानसिक शांति और आत्म-मूल्य को परिणाम का बंधक मत बनाइए।
शायद यही निष्काम कर्म की सबसे practical समझ है।
कर्म आपका है।
प्रयास आपका है।
निर्णय आपका है।

लेकिन हर परिणाम पर आपका पूर्ण नियंत्रण नहीं है।
इस अंतर को समझ लेना ही व्यक्ति को अत्यधिक चिंता से निकालकर बेहतर कर्म की ओर ले जा सकता है।

Frequently Asked Questions
1. निष्काम कर्म क्या है?
निष्काम कर्म का सामान्य अर्थ है ऐसे कर्म की दिशा जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्य को करता है, लेकिन कर्मफल के प्रति अत्यधिक या स्वार्थपूर्ण आसक्ति से बचने का प्रयास करता है।
2. क्या निष्काम कर्म का मतलब इच्छा छोड़ देना है?
नहीं। निष्काम कर्म को केवल सभी इच्छाओं को समाप्त करने के अर्थ में समझना बहुत सरल व्याख्या होगी। लक्ष्य रखना और बेहतर परिणाम की इच्छा करना सामान्य है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि व्यक्ति उस परिणाम के प्रति कितना आसक्त है।
3. क्या निष्काम कर्म में परिणाम महत्वपूर्ण नहीं है?
परिणाम महत्वपूर्ण हो सकता है। कर्मयोग का दृष्टिकोण परिणाम को पूरी तरह ignore करने के बजाय व्यक्ति को परिणाम के प्रति अनावश्यक आसक्ति से बचने और परिणाम से सीखने की दिशा देता है।
4. निष्काम कर्म और कर्मयोग में क्या अंतर है?
कर्मयोग एक व्यापक दार्शनिक दृष्टिकोण है। निष्काम कर्म उस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसमें व्यक्ति कर्म करता है लेकिन कर्मफल के प्रति स्वार्थपूर्ण आसक्ति कम करने का प्रयास करता है।
5. क्या निष्काम कर्म का अर्थ मेहनत कम करना है?
नहीं। निष्काम कर्म का अर्थ मेहनत या जिम्मेदारी से बचना नहीं है। बल्कि व्यक्ति से अपेक्षा है कि वह अपने कर्म को ईमानदारी और पूरी क्षमता से करे।
6. “कर्मण्येवाधिकारस्ते” और निष्काम कर्म का क्या संबंध है?
भगवद्गीता 2.47 का यह श्लोक कर्म और कर्मफल के संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें कर्म करने, फल को ही कर्म का एकमात्र कारण न बनाने और अकर्मण्यता से बचने की बात आती है।
7. क्या निष्काम कर्म आज के जीवन में उपयोगी है?
हाँ। इसे परीक्षा, career, business, relationships और personal goals के संदर्भ में एक ऐसी मानसिकता के रूप में समझा जा सकता है जिसमें व्यक्ति अपने प्रयास पर ध्यान देता है, परिणाम से सीखता है और परिणाम को अपनी पूरी पहचान नहीं बनने देता।